आस्था का महापर्व “छठ” पर व्रतियों ने दिया डूबते सूर्य को अर्घ्य

 

30 वर्षो में पहली बार सोना देवी ने घर पर किया पर्व

घाटों पर नही उमड़ी भीड़,घर पर छठ मनाना समझा उचित

विकास सिंह/आरा:– कोरोना वायरस के प्रकोप ने समाज से समाजिकता को लगभग समाप्त कर दिया है। लोग एक जगह एकत्र होने मेल जोल करने से भी बच रहे हैं. मार्च 2021 में होली के पर्व के बाद कोई भी पर्व या उत्सव सामूहिक रूप से नहीं मनाया जा सका। लोक आस्था और सू्र्य उपासना के पर्व चैती छठ के तीसरे दिन रविवार को पहला अर्घ्य दिया गया। शाम के समय डूबते भगवान सूर्य को अधिक लोगो ने अपने घरों के छतों पर तो कुछ लोगो ने घाट के किनारे जल चढ़ाया। शहर के आरा सहित पूरे जिले में गंगा तट से लेकर विभिन्न जलाशयों के किनारे छिटपुट श्रद्धालुओं ने अस्त होने वाले भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया और पूजा-अर्चना की तो अधिकतर व्रतियों ने अपने घरों में ही इस व्रत को किया। चार दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान के अंतिम दिन सोमवार को व्रती सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे। व्रती महिलाओं ने कहा कि छठ पर्व की ऐसी मान्यता है कि कोरोना महामारी जैसे कारणों से वो इसे नहीं छोड़ सकते, पीढी दर पीढ़ी लोग छठ व्रत कर रहे हैं। यही वजह है कि कोरोना की चिंता त्याग कुछ लोग छठ घाट पहुंच गए तो अधिकतर व्रतियों ने अपने घर पर ही परिवार के साथ पूजा की लेकिन जिनके घर मे व्यवस्था नहीं थी, वो छठ घाटों पर पहुंचे।गंगा तटों के साथ ही अपने घर पर छठ करने वाले व्रतियों के घर पर छठ पूजा के पारंपरिक गीत गूंजते रहे। वही लगभग 30 सालो से कार्तिक और चैत छठ पूजा को करने वाली आरा नगर थाना क्षेत्र के मझौआ निवासी भोजपुरी गायक संघ अध्यक्ष मुक्तेश्वर उपाध्याय की वृद्ध माँ सोना देवी कहती है कि लगभग 30 साल होने जा रहे हमारे द्वारा इस व्रत को करते हुए। लेकिन पहली बार ऐसा होने जा रहा जब हम इस व्रत को अपने घर पर कर रहे। देश मे जो कोरोना जैसी विप्पत्ति आयी है उससे हमे जिला प्रशासन के साथ मिलकर कर लड़ना होगा। सरकार के गाइडलाइंस का पालन करते हुए और जिला प्रशासन के आदेश को पालन करते हुए यह पर्व इस बार घर पर ही मनाने का निर्णय लिया है। व्रती सोना देवी आगे कहती है भगवान तीनो लोको में विराजमान है हर जगह उनका वास होता है।

इसीलिए यह पर्व को घर पर ही करना उचित समझा गया। उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ होगा समापन। इसके पहले व्रतियों ने शनिवार की शाम भगवान भास्कर की अराधना की और खरना किया था। खरना के साथ ही व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो गया था। पर्व के चौथे और अंतिम दिन यानी सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद श्रद्धालुओं का व्रत संपन्न हो जाएगा। इसके बाद व्रती अन्न-जल ग्रहण कर ‘पारण’ करेंगे। हिंदू परंपरा के अनुसार, कार्तिक और चैत्र माह में छठ व्रत का आयोजन होता है। इस दौरान व्रती भगवान भास्कर की आराधना करते हैं।


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